23 मई, 2011

अरुण साखरदांडे


कागलै रो सराध
कागली आपरै बेटै सूं पूछियो,
अरे, थारै जीसा रो सराध कोनी करणो कांईं ?
कागलै रो बेटो बोल्यो,
जीसा म्हारै खातर कांईं कर्यो ?
कागली बोली,
मान्यो जीसा तो
थारै खातर कीं नीं कर्यो
पण थनै जाम्यो तो है नीं ?

कागलै रो बेटो रीस मांय
दो-तीन वळा खुद रो माथो पीट्यो
अर बामण कागलै रै अठै गयो परो
ब्रामण कागलै तारीख बता दी
कागलै रो बेटो सराध री
सगळी तैयारी कर ली
सराध आळै दिन दो-च्यार गिनायती ई’ज आयग्या
बामण कागलै विधि-विधान सूं
सगळी रस्मां पूरी करी
कागलै रो बेटो
मिंदर पाखती पेड़ हेठै पिंड राख दियो

मिंदर रै दरवाजै बैठो
आधो पागल मंगतो
भाग’र आयो अर पिंड खावण लाग्यो
मिनख पिंड नै ले लियो, मिनख पिंड नै ले लियो
कागलै रो एक गिनायती रोळो कर्यो

कागली री आंख्यां गीली हुयगी
आंसू ढळक्या
दोय मोती पेड़ रै मूळ मांय टपक्या
अर सूखी रेत मांत रळग्या
***

कविता
कविता रचूं जणा
केई ताळ चोखी लागै
पण पछै एक एक सबद
आंख्यां आगै
सूज-सूज’र हेठै पड़ जावै
जाणै मर परो बो
धूड़ मांय रळ जावै ।
ओ सोच है कै मोरियो
आपरा रूपाळी पांख्यां पसार’र
नाचै
पछै
एक एक कर पांख्यां झड़ जावै
बां नै भेळा करता-करता
काळजो मूंढै कानी आवै
थारै गाला लाली लाज री
थारी आंख्यां मांय तंरग
थारो आवणो
थारो जावणो
थारो मुळकणो
थारो नीं होय परो ई होवणो
ऐ सगळा सदा-सदा खातर
म्हारी कविता रै आंगणै जीवता-जागता
रूपाळा रंगां लियां सबदां मांय
कांईं इंयां ई खिलैला ?  
***

एक दिन कांईं हुयो
एक दिन कांईं हुयो
घर आपरी जड़ां छोड़ दीवी
छप्पर उड़ता, सीटी बजावता
गया परा घूमण नै
थोड़ी’क ताळ मांय खंभा कीं विचार्‌यो
घाल हाथ मांय हाथ बै ई’ज
गया परा नाचण खातर
भीतां आपरा कान खोल्या
जद आंतरै कोई बड़बड़ावै
होळै-होळै बांरा पग
बां कानी मुड़या, आयो
म्हारै लाडा-कोड़ा लडायोड़ो
भींत माथलो कलैंडर
आयो म्हारै पाखती अर
खुल्लै बायरै मांय बो ई
कठै ई उड़ग्यो ।

पैली घर मांय
म्हैं हो ऐकलो
अबै म्हारो ऐकलापो
हुयग्यो जगत रो ।
***

एक रूंख नै घर चाइजै
एक रूंख जोरामरदी
म्हारै घर मांय घुसग्यो
केई बार म्हैं उण नै उखाड़’र
बगा दियो बारै
फेर ई’ज निसरमो
दूजै दिन पाछो मांयनै घुसग्यो
जड़ा जमावण लाग्यो पाछो ।
दिन च्यारे’क हुया कै
म्हैं टी वी देखै हो
रूंख री एक डाळ टी वी सूं बारै आई
परसूं जद पूजाघर मांय पूजा करण नै गयो
पूजाघर रै आखती-पाखती
उण री जड़ा रो जबरो जाळ बिछ्‌योड़ो हो
अबै हरेक कमरै मांय डाळ्‌यां फोड़ परी
उण री जड़ा ऊंची आई है
म्हारै खून रा गिनायती तो
भागग्या
छेकड़ म्हैं धार ली
उण घर नै खुद री छाती माथै सवार हुवण दां
इण खातर बांध परी गांठड़ी
म्हैं कठैई जावण रो मत्तो कर्‌यो
दिन उग्यां जद म्हैं जाग्यो
हिल कोनी सक्यो
म्हारै पगां मांय सूं जड़ा बारै आयगी ही
और तो और उण माथै कोमल कूंपळां
चमचमाट करै ही ।
***
अनुसिरजण : नीरज दइया


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कोंकणी कवि : अरुण साखरदांडे   जलम : 1948
कविता संग्रै : तीन कविता संग्रै प्रकासित नै कोंकणी भाषा मंडल, जनगंगा साहित्य पुरस्कार अर कविता संग्रह ‘कावलयाचें स्राद्ध’ नै साहित्य अकादेमी पुरस्कार बरस 2010 रो । 
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1 टिप्पणी:

  1. अनुवाद....चयन.....कमाल है....दोन्यू काम.....नीरज जी....जयजयकार होवै थारी..

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