मुत्तुलक्ष्मी

धुण लाग्योड़ा दिन
आ कुबाण काठी लागगी लारै
बिचाळै सूं पाछो मुड़ी आवूं
हरेक दाण ।

हुवै सामनो भूलां सूं
अर टुकड़ा मांय मिली
कामयाबी रै साथै
जिका भेज्या हा पाछा
जूण-जातरा रा अखूट आखर ।
  
बारंबार आवूं-जावूं उण पछै ई
खाडा अर धोरां री
सैंध कीं काम कोनी आवै
सामीं ऊभा होय जावै रोड़ा दांईं
सायरै खातर बपरायोड़ा साधन ।

काच री भींत माथै
हाका करता मारै थाप्यां
मारग री खोज
गांठ्यां खोलता-खोलता
बधता जावै भेद
महीना अर बरसां बिचाळै
बेरहमी सूं
सोख लेवै दिनां मांय सूं निरांयति
तौफान रै चक्कारियै दांईं ले उडै ।
***

सोबत
उजास नै ऊपर सूं थाम’र
सुरां नै संजोया राख्या
कर रिंधरोही रै कोल माथै पतियारो
घोसळो बणायो म्हैं ई ।

कदै-कदास लाग जावै
अणचाइजतो लांपो  
तद चलार’र रिंधरोही
बुलावै मेह मामै नै, बरसावै सागीड़ो मेह
बुझा’र अगन करै निरभय ।

अंधारै रै सागै
पसर जावै सूनवाड़
इण ढाळै अमन-चैन रै माहौल मांय
खुद खुद री परखूं धार
छीणी री आवाज भेळै
लालच
रिंधरोही रै बारै
माडाणी करावतो रैवै- भटका ।
***

अनुसिरजण : नीरज दइया
  
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तमिल कवयित्री : एस. मुत्तुलक्ष्मी
तमिल री युवा कविता मांय खास नांव । बेगी ई पैलो कविता संग्रह सामीं आवण मांय है ।
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साहित्यिक वातावरण में पला बढ़ा और आरंभ में राजस्थानी में ही लिखना स्वीकार किया, लेखन में भाषा नहीं वरन लेखन ही महत्वपूर्ण होता है । एम. ए. हिंदी और राजस्थानी साहित्य में करने के पश्चात “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध” विषय पर शोध कार्य किया । साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के लिए “ग-गीत” (काव्य संग्रह कवि मोहन आलोक) का राजस्थानी से हिंदी अनुवाद किया जो अकादेमी द्वारा 2004 में छपा । राजस्थानी में मौलिक कविता संग्रह के रूप में ‘साख’ तथा ‘देसूंटो’ कविता-संग्रह हैं । निर्मल वर्मा के कथा संग्रह और अमृता प्रीतम के कविता संग्रह के राजस्थानी अनुवाद भी किए जो महत्त्वपूर्ण माने गए हैं । अनेक सग्रहों में सहभागी रचनाकार के रूप में प्रकाशित और राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति अकादमी, बीकानेर की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ का संपादन भी किया । राजस्थानी कविता और अनुवाद के लिए कई मान-सम्मान और पुरस्कार भी मिले हैं । हिंदी कविताओं का प्रथम संग्रह ‘उचटी हुई नींद’ प्रकाशनाधीन है । "आलोचना रै आंगणै" (आलोचना) 2011